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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

नया वर्ष

शुचि'भवि'

आज सुबह से ही पारुल अनमनी सी थी।साल का अंतिम दिन था यह कि युग का,नहीं जानती थी वो।इधर उधर तितरा-बितरा सामान और बीच में गुमसुम सी बैठी पारुल।तभी आशू ने स्कूल बैग उसकी झोली में डाला और कंधें पर झूलते हुए बोला,"माँ भूख लगी है, जल्दी खाना दो न।" आशू पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था। पारुल ने उसके कपड़े बदले और उसे फिर से तैयार कर दिया।आशू कुछ समझ नहीं पा रहा था कि आज घर और माँ दोनों ही अलग से लग रहे थे उसे। "माँ, हम कहीं जा रहे हैं क्या?लेकिन डैडी तो अभी ऑफिस से नहीं आए हैं, शाम को आएँगे, तभी तो जाना है न न्यू ईयर पार्टी में?" पारुल ने उसे गोद में उठाते हुए कहा, नहीं बेटे, अभी ही जाना है। उसने दो सूटकेस में कुछ कपड़े, किताबें और खाने का सामान भरा और ओला बुला कर स्टेशन आ गयी।ट्रेन के चलते ही पारुल ने दो फ़ोन किये। पहला अपनी माँ को, "मम्मी ,मैं आ रही हूँ आशू के साथ, हमेशा के लिए" और दूसरा आशू के डैडी को,"मैं जा रही हूँ ,हमेशा के लिए।"

अगले दिन जब स्टेशन पर वो आशू के साथ उतरी तो साल ही नहीं पीछे छोड़ा था उसने अपितु दर्द,ज़िल्लत, अपमान,बेरुख़ी सब कुछ पीछे छोड़ अपने जीवन के नए वर्ष में क़दम रखा था।


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