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वर्ष: 3, अंक 53, जनवरी(द्वितीय) , 2019



दुविधा


शशांक मिश्र भारती


वह गांव में बुरी तरह बदनाम था। कोई उसे अच्छा नहीं कहता।घर से बाहर तक उसके काम ही कुछ ऐसे थे।

एक दिन वह मर गया । उसे दफनाने की व्यवस्था की गई गांव के मौलवी कहीं बाहर गए थे पड़ोसी गांव से मौलवी साहब बुलवाये गये। नये मौलवी को उस आदमी के बारे में कुछ पता न था। न ही उसने किसी से कुछ पूछा।और किसी ने मरने वाले के सम्बन्ध में कुछ बताने की आवश्यकता भी न समझी।दफनाने का समय आया तो नये मौलवी साहब परम्परा के अनुसार मरने वाले की प्रशंसा करने लगे। अपने मस्तिष्क से उसके अच्छे गुणों की झड़ी लगा दी।

समय का महत्व समझकर उसे एक नेक इंसान अच्छा पड़ोसी आदर्श पिता भाई पुत्र और बेटा साथ ही गांव का महान आदमी कर्मठ कर्मचारी आदि क्या-क्या न बता डाला।

उस मिट्टी में आयी मरने वाली की विधवा ने पास खड़े अपने बेटे के कान में कहा कि बेटा कहीं हम गलत आदमी की अन्तिम क्रिया में तो नहीं आ गये।

बेटा जाकर एक बार पता तो करके आ कि मरने वाला तेरा पिता ही तो है न।


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