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वर्ष: 3, अंक 53, जनवरी(द्वितीय) , 2019



पानी


राजीव कुमार


‘‘बहुत प्यासी हूं मांजी, पानी दे दो। खाने के लिए मत देना, पानी दे दो।’’ एक बूढ़ी भिखारिन आधे घंटे से आवाज लगा रही थी।

चिलचिलाती धूप उसकी प्यास को दुगुनी-तिगुनी कर रही थी।

भिखारिन के कटोरे में रखे रोटी पर मक्खियां भनभना रही थीं। वो एक बार मक्खी भगाती और आवाज लगाती। कोठी की मालकिन ने झांककर भी नहीं देखा। नौकरानी के हाथ से चावल-सब्जी भिजवा दी।

भिखारिन मन ही मन गुस्साई, फिर थोड़ी देर सोचने के बाद अपना कटोरा आगे कर दिया। उसके मन में यह भी आया कि कुत्ते के बर्तन से थोड़ी पानी पी ले मगर एक बार भोंकने पर ही वो भाग गई।

मन मसोसकर इधर-उधर देखा तो पेड़ के नीचे बैठी सहेली दिखी। पास जाकर देखा तो उसका कटोरा खाली था, अन्न का एक दाना भी नहीं था।

भिखारिन ने उसकी भूख का अहसास करते हुए कहा, ‘‘मेरे पास खाना बहुत है, दोनों खा लेंगे। तू सिर्फ पानी पिला दे।’’

दूसरी भिखारिन ने अपने थैले से पानी की बोतल निकाल दी। दोनों ने अदला-बदली कर अपनी पूर्ति की।

दूसरी भिखारिन बड़े-बड़े कौर मुंह में डालने लगी और पहली भिखारिन पानी का मुंह ऐसे धीरे-धीरे गले से उतार रही थी जैसे कि संजीवनी मिल गई हो।


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