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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

दया-दान का क्रेडिट

राजीव कुमार

शहर में दानी स्वभाव के लोग तेजी से उभर रहे थे, जरूरतमंदों की स्थिति में सुधार हो रहा था। अपंगों और असहायों के साथ-साथ आलसी और पुष्ट वालों की भी चांदी थी। दानी प्रवृति के लोगों की दान के्रडिट का स्कोर बढ़ रहा था। जरूरतमंदों में एक आठ साल का लड़का भी था विकास नाम का। दो लोग विकास के पास रूके, एक ने कहा ’’ यार देख, नए कपड़ों में कितना जंच रहा है, ये कपड़ा मैंने ही दिया है। छोटु याद रखना मेरा नाम गुलशन भाई है। ’’ कुछ दिन के बाद वही दोनों विकास के पास रूके और एक ने कहा ’’ यार उपर वाला हमको बरकत दे, मैंने कल बहुत बड़े रेस्टोरेंट में पेट भर अच्छा खाना खिलाया है, छोटे हमको भूलना मत, मैं सुहैल भाई हूँ।’’ कुछ दिन के बाद विकास दिन के समय नजर नहीं आने लगा और एक दिन अचानक विकास को गुलशन भाई और सुहैल भाई एक साथ मिल गए। दोनों ने विकास को एक स्कूल ड्रेस में देखकर पूछा’’ तुम स्कूल से आ रहे हो? ये किसने किया?’’ विकास ने मासुमियत से जवाब दिया ’’ उस आदमी ने अपना नाम नहीं बताया और कहा कि किसी को पता नहीं लगना चाहिए मेरे बारे में। ’’ दोनों एक दूसरे का मूंह देखते रह गए, विकास ने कहा ’’ ट्युश्न भी जाना है। ’’ बोलकर वह निकल गया।


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