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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

आदत

पवनेश ठकुराठी 'पवन

रामकिशोर चौहत्तर वर्ष की उम्र में भी रिक्शा चलाकर जीवनयापन करते थे। एक दिन मैंने उनसे कहा-" चाचा, आप इस उम्र में भी यह काम कर रहे हैं, जबकि आपके दोनों बेटे अच्छी नौकरी में हैं। अब तो आपको आराम करना चाहिए।"

रामकिशोर बोले- "नहीं बेटा, रिक्शा चलाकर ही पूरी जिंदगी गुजारी है। इसी रिक्शे ने बच्चों का जीवन संवारा। इसी रिक्शे ने मुझे सब कुछ दिया। इसे कैसे छोड़ दूं, फिर बैठे-बैठे खाना किसे अच्छा लगता है ! छोटी-छोटी चीजों के कारण बच्चे नाखुश हो जायें, अच्छा नहीं लगता। स्वाभिमान से जीने की आदत पड़ गई है बेटा ! अब यह बदल नहीं सकती।"


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