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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

कुण्डलियाँ

आकाश महेशपुरी

करते कर्म ग़रीब हैं, सुबह-शाम, दिन-रात। फिर भी दुख हैं भोगते, समझ न आती बात। समझ न आती बात, भला वे ही क्यों रोते। जो करते हैं काम, नहीं जी भर के सोते। घर भी देते बेच, कर्ज ही भरते भरते। रहते हैं बेहाल, काम जो करते करते।।1।। ऐसा युग है आ गया, दिखे नहीं मुस्कान। सब चिन्ता से ग्रस्त हैं, रोना है आसान। रोना है आसान, और जीना है मुश्किल। रहता है बेचैन, हमेशा बेचारा दिल। है सबकी यह चाह, मिले पैसा ही पैसा। पैसा छीने चैन, वक्त आया है ऐसा।।2।। किस्मत हमें किसान की, लगती मिट्टी धूल। पर इसके उपकार को, कहीं न जाना भूल। कहीं न जाना भूल, देश बढ़ता है आगे। सोना भी दे छोड़, कृषक जब जी भर जागे। खा के इसका अन्न, कभी इस पर हँसना मत। यही देश के प्राण, मगर ऐसी क्यों किस्मत।।3।। अपने ही खातिर करें, मदिरा से परहेज। यह सबको पागल बना, करती दुख को तेज। करती दुख को तेज, खेत घर सब बिक जाते। जो पीते हर शाम, कहाँ वे हैं बच पाते। जल्दी आती मौत, जल्द ही टूटें सपने। जल्दी होते दूर, करीबी सारे अपने।।4।। कंगाली जो सामने, देगें अगर परोस। सिर आएँगें आपके, दुनिया के हर दोष। दुनिया के हर दोष, साथ चलते जायेंगे। धनवानों का कोप, बढ़ेगा, थक जायेंगे। देख आपके कष्ट, लोग पीटेंगें ताली। हो जायेगी तेज, वही थोड़ी कंगाली॥5।। बढ़ना पर ये सोच लो, लगे राह में शूल। काँटों की भरमार है, हैं थोड़े से फूल। हैं थोड़े से फूल, भूल फिर कभी न करना। हो जाए ना नष्ट, कहीं तेरा सब वरना। खोलो दोनों कान, सुनो मानो ये कहना। सदा बढ़े तूँ यार, नहीं बिन देखे बढ़ना।।6।। जो प्रत्याशी बाटते, पैसे और शराब। हैं प्रत्याशी जान लो, सबसे वही खराब। सबसे वही खराब, देश गन्दा जो करते। इनको ठोकर मार, गलत धन्धा जो करते। तभी बचेगा देश , सुनो सब भारत वासी। करो उसे मतदान , सही हो जो प्रत्याशी।।7।।

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