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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

जीना चाहती हूँ मैं

वर्षा वार्ष्णेय

जीना चाहती हूँ मैं भी स्वच्छंद पंछियों की उड़ान के साथ । खिलना चाहती हूँ मैं भी भोर के सूर्य की किरणों के साथ । हाँ मैंने माना मैं एक औरत हूँ , तो क्या हुआ क्या मेरी कोई इच्छा नहीं ? मैंने माना मैं आज भी मैं ,मैं नहीं । आज भी गुलाम हूँ सिर्फ पुरुष की । अहम जाग ही जाता है वर्षों बाद , पुरुष होने के स्वाभिमान का । दंभ आ ही जाता है युगों बाद , पुरुषोचित व्यवहार दिखाने का । तुम जितना मुझे रोकोगे , उतनी ही मैं मजबूत बनती जाऊंगी । जितना रुलाओगे हर पल , उतना ही हिम्मत भरती जाऊँगी । आज नारी अबला नहीं , वो जाग रही है नई उम्मीदों के साथ । रामायण की सीता भी है , तो महाभारत की द्रौपदी भी । पाषाण की मूरत है तो , शबरी की जैसी भक्त भी । मीरा भी है कृष्ण की , तो कान्हा की राधा भी । सोचो जरा न होगी जब नारी , कैसे वजूद पाओगे । बिखर जाओगे तुम हमेशा , जब खुद को अकेला पाओगे । बहक जाते हो सुरा और सुंदरी में , मचल जाते हो अदा और पंसुरी में । अतीत में जाकर अपना भी वजूद देखो , याद आ जायेगी कहानी अपने अस्तित्व की


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