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वर्ष: 3, अंक 53, जनवरी(द्वितीय) , 2019



दूर तुमसे


सुशील शर्मा


                	  
हवाओं की गुजारिश है कि  
याद की खुशबू ,
घुल -घुल कर
तेरे आँचल पे ठहरे। 
गुरूरों की खाई
शातिर सी मंशा लेकर
बिछी है तेरे मेरे बीच। 
हवाएं खौफ से खामोश हैं। 
रात की तन्हाई में
सपने भी सहमे हैं, 
आत्मा के अक्षांश पर। 
देह के रिश्ते 
चिपके हैं मन के द्वार पर। 
अंदर खुद को कैद कर 
आत्मा के आर्तनाद में
खड़े तुम दूर बेहद दूर 
आत्मा के अंतिम किनारे पर। 
देह से मैं दूर था 
कुछ गुमनाम सा ...
कुछ बदनाम सा ...
कुछ अभिमान सा
स्नेह लिए तुम्हारे पास।
           

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