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वर्ष: 3, अंक 53, जनवरी(द्वितीय) , 2019



हिंदी हमारा गहना


सविता अग्रवाल “सवि”


                	  
हिन्द देश में जन्में हैं हम, हिंदी हमारा गहना है
आँख खुलीं जब जग में मेरी, कानों में इसको पहना है
बचपन से माता के मुख से, हिंदी भाषा मैंने सीखी
अंतर मन ने मेरे इसकी, कितनी ही शाखाएं सींची
बोला जब भी इसको हमने, मिश्री इसमें घुली हुई
कथा राम की और कृष्ण की, गाथा इसमें सजी हुई
संस्कृत भाषा जननी सबकी,इससे हिंदी का उद्गम है हुआ
पर भाषा की तोड़ जंजीरें, मनोरम परिचय हिंदी ने दिया
पहचान बना कर अपनी जग में, ओजस्वनी स्वयं को किया 
जन जन को धागों से अपने जोड़ कर गौरवशाली है किया
सूर और तुलसी ने प्रभु की महिमा का गुण गान किया
हिंदी से ही प्रेम रचाकर स्तुतियों का रसपान किया
कबीर दास ने इस भाषा में कितनी रचना रच डालीं
भक्ति रस में डूब डूब कर हो गई मीरा मतवाली
कितने ही वीरों नें अपने बलिदानों से देश रचा
उन वीरों की शूरवीरता का इसमें इतिहास बसा
लेकर अपने साथ चले और हर भाषा का मान करे   
कभी कभी समहित कर उसको अपने भीतर भाव भरे
गर्वित हैं हम भारतवासी हिंदी का हमें दान मिला
विविध कलाओं की जननी यह पुष्पों का हमें हार मिला
भ्रांत मन जब जब भटका है, संगिनी बनी मेरी हिंदी
भाल पर भारत माँ के सदा सजी रहे बन कर बिंदी
जब भी होगा नाद हिंदी का कली कली खिल जाएगी
विश्व के कोने कोने में यह स्वर्णिम लहर लहराएगी
हिंदी मेरी माता है, नाता ना इससे टूटेगा
संग रहेगी गुरु शिक्षा तब तक, अंतिम सांस जब छूटेगा
हिंदी हमारी शान है, इस पर हमें अभिमान है
पूर्वजों का दिया हमें अनोखा यह वरदान है
जय हिंदी, जय हिंदी, जय हिंदी | सदा चमकती रहे हिंदी |
             

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