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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

इस कदर न उलझो मुझमें

रवि प्रभात

इस कदर न उलझो मुझमें कि मैं खुद में उलझ जाऊँ बहुत घमंड था खुद पर मुझे तुम्हारे सामने मैं कैसे इतराऊँ कितना करूँ खुद से ही बातें तेरे पास कैसे मैं आ पाऊँ बेहिसाब करता हूँ प्यार तुमको तुम्हें यह कैसे मैं बताऊँ तुम ही बस जरुरत हो मेरी किसी और को अपना कैसे बनाऊँ कहीं भी रहो, खुश रहो अपनी उदासी में तुम्हें कैसे बुलाऊँ

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