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वर्ष: 3, अंक 53, जनवरी(द्वितीय) , 2019



नदी


रामदयाल रोहज


                	  
नदी जैसे ही निकली
आकाश ने झांककर कहा
ऐ!धरती सुन जरा सुन
तेरे कंधों से मुन्नी खिसक गई है
नदी परवाह किए बिना
पहाङ से तेजी नीचे दौङी
अपने प्रियतम से मिलने के लिए
मैदान तक आकर
थककर सुस्त हो गई
मैदान ने वश में करने को
खूब डोरे डाले
कई प्रलोभन दिए
पर वो टस से मस ना हुई
किसी ने बाँधने की कोशिश की
किसी ने जहर पिलाया
किसी ने रास्ता भटकाया
किसी ने कहा
यहाँ से आगे बढी
तो मैं तुम्हारे शरीर के
टुकङे टुकङे कर दूंगा
लेकिन हौंसले के आगे राह के रोङे भी
कदमों को गति देते है
और वही हुआ
कि वह जा पहुँची
अपने प्रियतम समन्दर के पास
और समन्दर ने भर लिया था
उसे अपनी बाहों में
अब दोनों का शरीर मिलकर
हो गया था एक
कोई जुदा नही कर सकता|
 

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