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वर्ष: 3, अंक 53, जनवरी(द्वितीय) , 2019



हिम्मत की जीत


रामदयाल रोहज


                	  
 
बैठे भरोसे भाग्य के मंजिल वो पा सकते नहीं
हिम्मत बिना दो वक्त की रोटी जुटा सकते नहीं
फोङकर पाषाण को अंकुर जीवन पाता है
लोहा ले शीतोष्ण से धरती पर लहराता है
निराश हो सागर कभी तूफां मचा सकते नहीं
हो पवन कातर तो तिनका भी हिला सकता नही
तोङकर चट्टान को नदियां निकलती है
फिर शान से मैदान में मस्ती से चलती है
देखकर बाधाएं क्या नौकाएँ हटती है
आकर सभी सम्मुख बाधाएँ ही पिटती है
चींटी भी बिन प्रयास के अन्नकण जटा सकती नहीं
हिम्मत बिना मैदान भी साथी कभी बनता नहीं
 

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