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वर्ष: 3, अंक 53, जनवरी(द्वितीय) , 2019



झिझक


नीतू शर्मा


                  
मन तो बहुत किया
मैं भी अपनी बात कहूं
अपना मत रखू
सबके समक्ष
फड़फड़ाते होठ 
आतुर हुए कुछ कहने को
लेकिन...
हमेशा की तरह
उसने मुझे टोक दिया
कुछ भी कहने से रोक दिया
बस चुप्पी साधे 
सबको देख रही थी
आज फिर मैं उससे हार गई
और मेरी 'झिझक' 
एकबार फिर जीत गई ।
                 

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