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वर्ष: 3, अंक 53, जनवरी(द्वितीय) , 2019



मैं और तुम


लता प्रासर


                    
इन्हीं सफेद लाल फूलों में ढूंढती रही
नसों में दौड़ते लाल सफेद रक्त कण की तरह
ऐ जिन्दगी तू कहीं भी आशियाना बना लेती
लाल लाल सूर्य सा यह लाल फूल
चांद सा रौशन ये सफेद फूल
कभी मांग में सज जाता
कभी होंठों पर
कभी कलाइयों में
पूरे बदन को ढंक ये लाल रंग
हमें सराबोर कर देता
आंखों की लाली में प्रेम टपकता
तब टुकुर-टुकुर देखते
प्यार की थाह लेते
ओह ये लाल रंग
ना जाने क्यों मुझे प्रेम की चादर सा लगता
जिसे ओढ़ खुद को भूलने की कोशिश होती रही है
जन्म जन्मांतर से आजतक
धरती के कोने कोने में छुपने की कोशिश की
लाल रंग से छुप नहीं सका 
जिंदगी की सांसें यही लाल रंग गिनता रहा
धरती लाल चूनर ओढ़ रिझाती बुलाती
शर्माती हरी झालर सजाती
उसपर सफेद बेल बूटे
सफेद फूल फह फह उड़ता धोती सा
संगत कराता श्वेत रक्त कण और लाल रक्त कण
गति बढ़ जाती धड़कनों की
धौंकनी  की तरह फेफड़े भी फड़कने लगते
ओह ये लाल सफेद फूल
कहीं मैं और तुम तो नहीं!                   
                 

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