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वर्ष: 3, अंक 53, जनवरी(द्वितीय) , 2019



भावावेग


कुन्दन कुमार


                    
उदर का ये गोरापन 
उर से इठलाती यौवन 
वाणी में मधुमास लिए 
नैनों में मधुवास लिए 
कर दे सभी सर्वस्व समर्पण 

निर्मल पांव में बंधी ये पायल 
विचरण के तेरे हर कायल 
सुरधुन तेरे इन चापों के हम 
जीवन के अपने राग बनायें 
भूखंड हो गये पुनः ये घायल 

पवनदेव से विनती करते 
क्यों न तेरे आँचल ये सरकते 
कोई झोंका हवा का आये 
मदहोश छटा हमको दर्शाये 
इक दरश के खातिर जग - जन रोते 

रक्त बहे या प्राण उड़े 
आश ये लव पर तेरे होंठ फिरे 
चैतन्य ह्रदय का चेतन खोकर 
घिरे हथेली तेरे मर्म धरोहर 
निर्भंग की चाहत स्वेद बहे 

कहाँ छुपाएगी ये गगरी 
डूब रहे जिसमें नर - नगरी 
बहे भी क्यों न तू जो उड़ती 
चहुओर निरंतर फिरती तितली 
चाह में तेरी चित्त - विहीन मंजरी 

बने स्वर्ण परिवर्तन केश तेरे 
कौमुदी उतर मुख दमक रहे 
दुकूल सबल मन ज्वार भरे 
वेग शांत कर नैन ये अनिमिष 
कामार्त नृत्य सीने पे करे 

आज अरुण सरोवर के पीछे 
ब्योम - सर तरुशिखा के नीचे 
हुआ अचम्भा सरनीर थपेड़े 
पुलिन पल्लवित बैठ भामिनी 
करते उर के शतदल फेरे 

प्रशमित मन उद्वेलित पावक 
देख दृश्य रमणी अंग जावक 
अनघ विनय शर्णार्थ हो कारक 
भंवर वासना चित्त ये दुस्तर 
सत्वर प्रमदा मुस्कान मुख वाचक 

अनंत आनंदित पा आमंत्रण 
अमा विभा है जीवन खंडन 
पुलकित देख रजनी घन आगमन 
अब देर नहीं वायु ज्वाला संग 
चल शैर करें निर्वस्त्र अंग दर्पण 

अर्धनग्न हेम अंग थी लेटी 
वासनावर्त अतिशीघ्र समेटी 
चुम उठे थी ख्वाब लपेटी 
मुक्तसुत हुई ताम्रकुम्भ तुंग 
तृप्त हुए कर मधुपान दुपटी 

लिपटे रहें पूर्ण अमा बदन से 
फिरते रहें अंग चुभन शिरों से 
उफन रहा नित स्वेद ज्वलन से 
भींग रहें तन, मन पियूष मदिर 
हस्त घिरे उभार हर कण से 

जब विधु उडुगन विदा लिए 
रवि निशागर्भ से मुक्त हुए 
तब ये नर मन संतुष्ट हुए 
बाँहों की विभा वो वरुणीधार 
सब त्याग अशनि बन लौट चले 

प्रभात किरण चहुदिश जब फैला 
तृण फुनगी पर बैठ अकेला 
मलय मुखमण्डल अनघ मन मैला 
क्षण एक नारी के रूप में लिप्त 
दहा दिए तप - निष्ठ - शत - ज्वाला 

वो काल भी था अतिदैन्य तो कैसा 
भोग कमल मुख धीर पुरुषा 
पुरुषार्थ भंग सुरधुन बहे जैसा 
वो वक्त मनोरम नारी मन का 
कर आत्म समर्पण जीवन सहसा 

कर निश्चय न फिरे पुनः फिर 
न आत्मदाह हो दुर्घर्ष धीर 
प्रणय - विनय में भी मन स्थिर 
देख कहीं गर निर्मल काया 
नैन अन्यत्र या नतमस्तक हो गिर ।

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