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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

मिटने का यूँ दुख न होता

कमला घटाऔरा

मिटने का यूँ दुख न होता जो तुम बरसते बन प्रेम घन भीग भीग हो जाती शान्त जन्म जन्म की विरह तपन । बहती रहती प्रेम सरिता उर में छू पाती जो तेरे उर का कूल जीने का सुख पा लेती मैं भी देख भाग्य हुआ मेरा अनुकूल । सागर से दिल में समाने को जाने कितनें पैंडे चली थी किस्मत ने उड़ा फेंका बाहर हाय भाप बना नभ की ओर? ढ़लने देती दिल की सीपी में मूल्यवान मोती तो बन पाती जीवन हो जाता सार्थक यह मिटने का यूं दुख न होता ।

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