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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

शिवत्व ही समग्र है

जया पाण्डेय 'अन्जानी'

उसी से मायाजाल है। वही तो सत्य सार है।। उसी से कालचक्र है। शिवत्व ही समग्र है।। 'रिक्तता' का राज था। शून्य सर्वव्याप्त था।। स्पर्श ना प्रकाश था। ना ध्वनि-निनाद था।। आकार जो लिए तभी। 'साकार' जो हुए तभी।। 'ओम' स्वर उदित हुआ। अथाह तम विरत हुआ।। जिनसे सब प्रकट हुए। नक्षत्र, सूर्य, ग्रह हुए।। प्राण का सृजन किए। सृष्टि का गठन किए।। प्रकृति जो दीप्त है। मिथ्या में प्रलिप्त है।। ऊर्जा का संचार है। श्वास का आधार है।। वही तो पँचभूत है। सबका मूलरूप है।। तम, रज, सत्व वो। परम् ब्रह्म तत्व वो।। अनादि वो अनन्त वो। प्रचंड वो अखण्ड वो।। है 'वेद' वो, 'पुराण' वो। है ज्ञान का प्रमाण वो।। वो 'बंधनों' का सार है। वो मोक्ष का विचार है।। "प्रेतों" का भी नाथ है। महादेव 'विश्वनाथ' है।। त्रिनेत्र वो त्रिकाल है। वस्त्र व्याघ्र छाल है।। गले 'भुजंग' माल है। भभूत का श्रृंगार है।। वही है मौन 'शान्ति'। वही विलाप व्यग्र है।। शिवत्व ही समग्र है। शिवत्व ही समग्र है।।

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