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वर्ष: 3, अंक 53, जनवरी(द्वितीय) , 2019



अब तू ही बता दे यार


कवि जसवंत लाल खटीक


                    
चारों तरफ की चहलकदमी ,
ठिठुरती सर्दी की रातें ,
रातभर चलती हवाओं की आहट ,
और ठंड से काँपते पक्षियों की आवाज ,
इतना सबकुछ होते हुए भी ,
अब तू ही बता दे यार ,
मेरे दिल में इतना सन्नाटा क्यूँ है ।।
वो मूसलाधार बारिश ,
डरावनी बिजलियाँ ,
गड़गड़ाहट करते काले बादल ,
और वो पानी के टप-टप की आवाज ,
इतना सबकुछ होते हुए भी ,
अब तू ही बता दे यार ,
मेरे दिल में इतना सन्नाटा क्यूँ है ।।
वो आग उगलता सूरज ,
बदन को जलाते लू के थपेड़े ,
टीलों से उड़ती हुई रेत ,
और प्यास से तड़पते जानवरों की आवाज ,
इतना सबकुछ होते हुए भी ,
अब तू ही बता दे यार ,
मेरे दिल में इतना सन्नाटा क्यूँ है ।।
वो बसंत का मौसम ,
फूलों से खेलती तितलियाँ ,
हवाओं संग लेते हिलोरे ,
और पेड़ों से गिरते पत्तों की आवाज  ,
इतना सबकुछ होते हुए भी ,
अब तू ही बता दे यार ,
मेरे दिल में इतना सन्नाटा क्यूँ है ।।
वो ढलते हुए साल का मंजर ,
नए साल के स्वागत का आलम ,
वो डीजे पर ठुमकती कमर ,
और धुँ-धुँ करते पटाखों की आवाज ,
इतना सबकुछ होते हुए भी ,
अब तू ही बता दे यार ,
मेरे दिल में इतना सन्नाटा क्यूँ है ।।
तेरे दूर जाते कदम ,
धक-धक करती दिल की धड़कन ,
वाट्सअप के मैसेज की बीप ,
और मोबाइल की रिंगटोन की आवाज ,
इतना सबकुछ होते हुए भी ,
अब तू ही बता दे यार ,
मेरे दिल में इतना सन्नाटा क्यूँ है ।।
दिनभर आती हिचकियाँ ,
तन्हाईं में कदमों की आहट ,
तेरे इंतजार में घड़ी टक-टक , 
और "जसवंत" के टपकते आँसू की आवाज ,
इतना सबकुछ होते हुए भी ,
अब तू ही बता दे यार ,
मेरे दिल में इतना सन्नाटा क्यूँ है ।।

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