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वर्ष: 3, अंक 53, जनवरी(द्वितीय) , 2019



देश प्रेम का जज्बा


जनकदेव जनक


                    
तेरी जमीं को अपने खून से नहला सकता हूं
तेरे आसमां को अपने जुनून से दहला सकता हूं
हमारी जमीं पर नापाक कदम रखने वाले
तेरी हस्ती को होलिका की तरह जला सकता हूं
अपने चमन की हर कली की हिफाजद के लिए 
अपने वतन की हर गली की सलामत के लिए
मादर-ए-हिंद की कसम है सबको,
शहादत के लिए तैयार हो जाओ.

चांदनी की मुस्कराहट से हमें क्या लेना
तारों की सजावट से हमें क्या लेना
जिसे इंतजार है कफन के एक टुकड़े का
उसे बहार की आहट से क्या लेना

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