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वर्ष: 3, अंक 53, जनवरी(द्वितीय) , 2019



टूटना


दिनेश कुमार


                	   
कुछ चीजें
अक्सर टूट जाया करती हैं 
जैसे टूट जाते हैं 
खिड़कियों के काँच 
जैसे टूट जाते हैं 
किमती कप और प्यालियाँ
जैसे टूट जाते हैं 
डालियों से हरे पत्ते 
जैसे टूट जाया करती हैं 
आसमान से बिजलियाँ
वैसे ही कुछ 
टूट जाता है इंसान
इंसान का टूटना 
काँच, कप, पत्ते या कि 
बिजलियों जैसा नहीं है 
क्योंकि जब चीजें टूटती हैं 
तो दूसरी मिलने या जुड़ने की 
सम्भावना भी की जा सकती है 
लेकिन जब इंसान टूटता है 
तो उसके टूटने का दुख 
उसके अंतःकरण में घर कर जाता है 
जिसे मिटा पाना सम्भव तो होता है 
लेकिन बहुत ही मुश्किल भी l
       

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