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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

नया वर्ष आया है...

डॉ दिग्विजय कुमार शर्मा "द्रोण"

तुम कहते हो नया वर्ष है आया यहां सब कुछ वही है जो कल बीत गया तिथियों के बदल जाने से यहां नही कुछ बदला है वही है शरद की राते, वही है मुसाफिर वही राज नेता, वही कलमगार हैं वही तो लोग है यहां, वही सोच भी उनकी यहां नया कुछ भी नही, न ही बदला है बस बदला है तो बस अंको का बदलना। अगर बदलना ही है तुमको तो अपनी सोच को तुम बदलो अपने कर्तव्य को समझो, निस दिन सत्य का पालन करो और नएपन का भावभर नई ऊर्जा के साथ एक नया परिवर्तन अपने देश और देशवासियों के तन मन भर डालो। जो नया करने को रहता है मन उत्साहित बीत गया जो दिन है उससे सीखो और अपने मे सुधार करो बहुत भविष्य की चिन्ता छोड़ो नित नए विचारों का संकल्प लो और स्वच्छ भावनाओं के साथ कुछ नया करो। करो कुछ नया देश हित के वर्तमान में अपने पूर्वजों से सीख नई पीढ़ी का आगाज करो रातें पूस की शरद की गहरी दिन में कुहासा और धुन्धु रहे गरीब पड़ा है गठरी सा बन अमीर हुआ मदमस्त बड़ा। अकड़न जकड़न और ठिठुरन है कहां यहां नव वर्ष रहा। सूरज की आशा में बैठे कि कब आये जाड़ों के दिन धूप यहां सोचो तुम अब देश वाशियो कैसे गरीब का चूल्हा जले यहां गरीब और गरीब होता यहाँ धनवानों पर धन की कमी नही वक्त बड़ा बलवान यहां पर कब क्या हो कुछ पता नही। आएगा नव वर्ष शीघ्र अब जब धरा करेगी श्रंगार यहां रंग बासन्ती की चादर ओढ़ धरा तब गरीब किसान भी खेतों में नाचेगा कवि विजय भी तान में अपनी नए नए गीत गायेगा चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा को हर्षित नव वर्ष है आएगा।


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