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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

बेटी का दर्द और कुछ सवाल

अनिल कुमार

आईये साहब कुछ बात करते हैं जंगल के कानून से बाहर जंगली होने का एहसास करते हैं फटे हूए कपड़ों में एक और लाश के बेआबरु होने पर देश के कानून से सवाल करते हैं क्यों कानून ने अपने ही हाथों में बेड़ियाँ डाली हुई हैं ? हर रोज एक बेटी क्यों भेड़ियों के हवाले हुई है ? क्या देश के कानून में ऐसे चलाने वाले नहीं हैं ? जिसने जलाया एक बेटी को बेआबरु करके जिन्दा क्या इस देश में उन दरिंदों को जिन्दा जलाने वाले नहीं हैं ? कानून से तो किताबों के पुलिंदे भरे पड़े हैं पर क्या कानून को लेकर चलने वाले कोई बाशिंदे नहीं हैं ? और देखो इस देश की जनता जनार्दन को दिन में मशाल लेकर बेटी बचाते हैं पर उनमें से ही कोई रात के अन्धेरे में फिर किसी बेटी को बेआबरु कर जिन्दा जलाते हैं अब सोचो कानून बनाने वालो और सोचो कानून के रखवालो कब तक जंगल से बाहर जंगलीपन छायेगा ? कब तक देश की बेटी को लूटा और कुचला जायेगा ? क्यों बेटी आजादी की साँस नहीं ले सकती ? जब बेटा आजाद हुआ, तो क्या बेटी आजाद नहीं हो सकती ? और पूछो सब अपने-अपने अन्तर्मन से कि तब बेटी के दिल पर क्या गुजरी होगी ? जब वहशी दरिंदों ने उसकी इज्जत लूटी होगी ।


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