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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

मसीहा मैं कर्म का हूँ

अल्पा मेहता

मसीहा मैं कर्म का हूँ, न लोग समझ पाए यहाँ ऐसे धर्म का हूँ | लगती है बोली इस युग में उपरवाले की, न लाज शर्म यहाँ इस व्यापार की, आज मैं बड़ा शर्मशार हूँ | मसीहा मैं कर्म का हूँ, न लोग समझ पाए यहाँ ऐसे धर्म का हूँ | खेलते हैं खेल यहाँ मुसीबत के मारो से, अनपढ़ लोगों से, इन गरीब लाचारों से, आज मैं बड़ा अग्रसर हूँ | मसीहा मैं कर्म का हूँ, न लोग समझ पाए यहाँ ऐसे धर्म का हूँ | अनजान डर सा पहरा, ज़हन में लोगों के बिठाके, लूटते, पैसे ऐंठ के, गरीबों को निचोड़-निचोड़ के, आज मैं आक्रोशधार हो गया हूँ | मसीहा मैं कर्म का हूँ, न लोग समझ पाए यहाँ ऐसे धर्म का हूँ | झुक जाती है आँख मेरी जब, औरत बेआबरू होती देखता हूँ, उन मासूम लड़कियों की चींखे सुनता हूँ, उन्हें निसहाय पाता हूँ.. आज मैं छल हुआ महसूस कर रहा हूं | मसीहा मैं कर्म का हूँ, न लोग समझ पाए यहाँ ऐसे धर्म का हूँ | गुनाह करते देखते हुए भी अबला नारी को बचा नहीं पा रहा हूं, छोटी बच्चियों की आहें सुनकर भी अनसुना कर रहा हूं, आज मैं खुद को तिरस्कृत महसूस कर रहा हूँ | मसीहा मैं कर्म का हूँ, न लोग समझ पाए यहाँ ऐसे धर्म का हूँ |


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