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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

गौरय्या के गाँव में

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सन्नाटा पसरा है अब तो, गौरय्या के गाँव में। दम घुटता है आज चमन की, ठण्डी-ठण्डी छाँव में।। -- नहीं रहा अब समय सलोना, बिखर गया ताना-बाना, आगत का स्वागत-अभिनन्दन, आज हो गया बेगाना, कंकड़-काँटे चुभते अब तो, पनिहारी के पाँव में। दम घुटता है आज चमन की, ठण्डी-ठण्डी छाँव में।। -- परम्परा के गीत नहीं हैं, अब अपने त्यौहारों में, भुला दिये है देशी व्यञ्जन, पूरब के आहारों में, दबा सुरीला कोयल का सुर, अब कागा की काँव में। दम घुटता है आज चमन की, ठण्डी-ठण्डी छाँव में।। -- घास-फूँस के माटी के घर, अब तो नजर नहीं आते, खेत-बाग-वन आज घरा पर, दिन-प्रतिदिन घटते जाते, खोज रहे हैं शीतल छाया, कंकरीट की ठाँव में। दम घुटता है आज चमन की, ठण्डी-ठण्डी छाँव में।।

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