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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

अगर तुम न मिलते

डॉ. रंजना वर्मा

भला किस तरह ख़्वाब से दिल बहलते । अगर तुम न मिलते, अगर तुम न मिलते ।। न मिलते हमें तेरी यादों के धारे , बही जाती नैया किनारे किनारे । क़दम लड़खड़ाते न लेकिन सँभलते । अगर तुम न मिलते, अगर तुम न मिलते ।। रखा ज़िन्दगी ने तुम्हें अजनबी था , बसो ख़्वाब में ऐसा सोचा नहीं था । कटी रात सारी क्यों करवट बदलते । अगर तुम न मिलते, अगर तुम न मिलते ।। मसर्रत ठहरती नहीं थी दिलों में , पड़ी थी बड़ी ज़िन्दगी मुश्किलों में । जमे दर्द सब दीप के सँग पिघलते । अगर तुम न मिलते, अगर तुम न मिलते ।।

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