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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

नए वर्ष की प्रथम भोर

राकेश खंडेलवाल

नए वर्ष की प्रथम भोर की पहली पहली किरण सुनहरी अब इस बार खोल दें गाँठे बंधी हुई अरुणिम आँचल की वर्ष वर्ष गुज़रे आशा की टूटी किरचे चुनते चुनते नए वर्ष की अगवानी में नई नई आशाएँ बुनते लेकिन सदा फिसलती डोरी हाथों से उड़ती पतंग की बीत गई हर एक घड़ी बस प्रतिध्वनियो को सुनते सुनते नए वर्ष का दीप जलाकर लाई देहरी किरण आज तू अब इस बार स्वरों की सरगम घोल कंठ में हलकी हलकी आँधी आती रही गली में पथ के सारे दिए बुझाकर सुनी नहीं अम्बर ने भेजी सारी आवाज़ें लौटाकर सूरज के रथ के पहियों की खिंची लीक पर चलते चलते परिवर्तन को ढूँढ रही है दृष्टि आज रह रह अकुलाकर हुई अपेक्षाओं में वृद्धि वातायन पर नज़रें केंद्रित नया वर्ष ये दुहराये न, बीती हुई कहानी कल की तय हो चुका अभीतक जितना वो सारा ही सफ़र भला है अब तेरे संग चमक रहा ये गगन और कुछ धुला धुला है जागी नई नई निष्ठाएँ जीवन के बाव संकल्पों पर साँसों की बगिया में आकर संदल जैसे घुला घुला है नए वर्ष की किरण खोल दे अब प्रकाश के स्रोत बंद जो खिलती रहें पाँखुरी जिससे यहाँ ज्ञान के श्वेत कमल की

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