मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

जीवन में सब सहते जाओ

डॉ० अनिल चड्डा

न आह भरो, न नीर बहाओ, जीवन में सब सहते जाओ। जब वक्त तुम्हारे संग चले, तो दुश्मन भी मिलते हैं गले, जो साथ चलें, वो सबसे भले‌, जो छोड़ गया, उसे भूलते जाओ, जीवन में सब सहते जाओ। वादों में तुम न भटका करो, कभी राहों में न अटका करो, जो राह मिले, उस राह चलो, जीवन में आगे बढ़ते जाओ, जीवन में सब सहते जाओ। शीशा तो सच ही दिखाता है, वो सबको तो नहीं भाता है, तू फिर क्यों आँसू बहाता है, बेझिझक सच को कहते जाओ, जीवन में सब सहते जाओ।

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें