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वर्ष: 3, अंक 53, जनवरी(द्वितीय) , 2019



दोहे


शुचि 'भवि'


                	  
घृणा-द्वेष-नफ़रत मिटे, सुख हो सबके पास।
स्वागत में नववर्ष के,निखरें सबकी आस।।

नैतिकता धारण करें, करें सभी  सत्कर्म।
स्वागत में नववर्ष के,सभी निभाएँ धर्म।।

मंगलमय नववर्ष हो,सबको 'भवि' हो हर्ष।
यही हमारी कामना, शुभ हो यह नव वर्ष।।

मैल दिलों का दूर हो,निखरे नए ख़याल।
नूतन नूतन वर्ष में,  रहें  सभी  ख़ुशहाल।।

स्वागत में नववर्ष के, करें सभी संकल्प।
बीती ताहि बिसार दें, ये ही एक विकल्प।।

मन मंदिर में छा गया, नवल धवल ये हर्ष।
चलो मनाएँ हम ख़ुशी, आया है नववर्ष।।

सुख-सुविधा से युक्त हो,मंगलमय नववर्ष।
सुखी  रहे हर आदमी,सभी ओर हो हर्ष।।


पूरी सबकी आस हो, रहे न कहीं मलाल।
पूर्ण करे हर कामना, आने वाला साल।।

तन मन में सबके भरा, देखो कितना हर्ष।
आओ हम मिलकर कहें, स्वागत है नववर्ष।।

सूर्य रश्मियाँ आ गयीं,  लिए गुनगुनी धूप।
मना  रहे  नववर्ष सब, एक  रंक  या भूप।।

धरा  भले  हो  देश  की,  चाहे  रहे  विदेश।
सजा हुआ नववर्ष में,सबका नव परिवेश।।

स्वागत में नववर्ष के, खिलें हृदय के फूल।
रागद्वेष की हर जगह, मिटी देखिए धूल।।

हर दरवाजे पर खड़ीं, देखो खुशियाँ आज।
चलो   करें नववर्ष   का,  ज़ोरों से आग़ाज़।।

राजनीति 'भवि' स्वच्छ हो,नीति बने कुछ ख़ास।
स्वागत  का   नववर्ष   के,  नहीं  बने  उपहास।।

स्वागत  है  नववर्ष  का,  इस  आशा  के  साथ।
अमित पताका हिंद की,रखें अमित 'भवि' नाथ।।
             

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