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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

जिजीविषा

डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रहती है आकांक्षा, जब तक घट में प्राण। जिजीविषा के मर्म को, कहते वेद-पुराण।। -- जीने की इच्छा सदा, रखता मन में जीव। करता है जो कर्म को, वो होता सुग्रीव।। -- आशायें जीवित रहे, जब तक रहे शरीर। जिजीविषा के साथ में, सब करते तदवीर।। -- धन-दौलत की चाह में, पागल हैं सब लोग। जीवन के हर मोड़ पर, जिजीविषा का योग।। -- जिजीविषा का है नहीं, जग में आदि न अन्त। जोत जगा कर ज्ञान की, बन जाओ श्रीमन्त।। -- मानस में खिलते रहें, जिजिविषा के फूल। लेकर प्रीत कुदाल को, मिटा दीजिए शूल।। -- बड़ा अनोखा है यहाँ, जिजीविषा का मन्त्र। तन्त्र चलाने के लिए, जिजीविषा है यन्त्र।।

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