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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

परिवेश पर विविध दोहे

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

उच्चारण सुधरा नहीं, बना नहीं परिवेश। अँगरेजी के जाल में, जकड़ा सारा देश।१। -- अपना भारतवर्ष है, गाँधी जी का देश। सत्य-अहिंसा के यहाँ, मिलते हैं सन्देश।२। -- लड़की लड़का सी दिखें, लड़के रखते केश। पौरुष पुरुषों में नहीं, दूषित है परिवेश।३। -- भौतिकता की बाढ़ में, घिरा हुआ है देश। फैशन की आँधी चली, बिगड़ गया है वेश।४। -- हरकत से नापाक की, बिगड़ रहा परिवेश। सीमा पर घुसपैठ को, झेल रहा है देश।५। -- नहीं बड़ा है देश से, भाषा-धर्म-प्रदेश। भेद-भाव की भावना, पैदा करती क्लेश।६। -- प्यार और सदभाव के, थोथे हैं सन्देश। दाँव-पेंच के खेल में, चौपट है परिवेश।७। -- खुद जलकर जो कर रहा, आलोकित परिवेश। नन्हा दीपक दे रहा, जीवन का सन्देश।८। -- सूफी-सन्तों ने दिया, दुनिया को उपदेश। अपने प्यारे देश का, निर्मल हो परिवेश।९। -- रखना होगा अमन का, भारत में परिवेश। मत-मजहब से है बड़ा, अपना प्यारा देश।१०। --

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