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वर्ष: 3, अंक 53, जनवरी(द्वितीय) , 2019



कांप रहे हैं ठिठुरन में


डॉ.प्रमोद सोनवानी पुष्प


                	  
सूरज दादा आओ जी ,
सर्दी दूर भगाओ जी ।
कांप रहे हैं ठिठुरन में ,
खिली धुप ले आओ जी ।।

सुबह - सवेरे हम तो दादा ,
उठ न पाते जाड़े में ।
याद हमें आती है नानी ,
जहाँ नहाते जाड़े में ।।

सर्दी ओर इतराये ना ,
उसको सबक सिखाओ जी ।
कांप रहे हैं ठिठुरन में ,
खिली धुप ले आओ जी ।।
                 

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