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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 77, जनवरी(द्वितीय), 2020

कवयित्री श्री संध्याबहन भट्ट की
कविता "चंदा" का हिन्दी अनुवाद

अनुवादक: डॉ.रजनीकान्त एस.शाह

आकाश में चंदा कभी गेंद बनकर फुसलाए कभी कटारी बनकर बींधे कभी आधी रोटी खिलाये और आधी की भूख जगाए कभी उसे देखने का संकट तो कभी वृक्ष की ओट में छिपकर वह हमें देखे! सदियों से उसकी आदत बन गई है घटने-बढने की, सागर जल को भी घसीट ले जाने की..... उसे कभी दंडित नहीं किया किसीने- लोगों के दिमाग को भटकाने के लिए उसे मिली है सारी छूट.... बादल के पीछे छिप जाए या किसी की खिड़की पर आकर बैठ जाए। कभी हमारे संग प्रवास करे और कभी पूरा का पूरा समा जाए हमारे भीतर….. चाहे जब वह बन जाए प्रेम का साक्षी, और कभी वह बस देखता रहे किसी के गर्म आंसु को- ठंडा होकर। सब कहते हैं चांद में दाग है। ना,ना,चांद में भरी सूरज की आग है- जिसे खाली करने के लिए वह सदियों से खुद टूटता है और जुड़ता है..... चंदा कहाँ किसी की समझ में पूरा पूरा आता है??


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