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Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 100, जनवरी(प्रथम), 2021

आधी रात का सबेरा

सुरेश सौरभ

कुत्ते, कमीने, नालायक जिसकी दी हुई थाली में खाता है, उसी में छेद करता है। मैंने तुझे पढ़ा-लिखा कर क्या इसी दिन के लिए कुछ बनाया था कि किसान का बेटा होकर किसान के ही खिलाफ लिखे। नामुराद मुझे लगता है तू मेरी नहीं किसी और की औलाद है, अगर मेरी होती, तो आज इस तरह से मेरा नाम पूरी दुनिया में न डूबाती फिरती। चोर, उठाईगीर, कलम की वेश्यावृति करने वाला आवारा सांड...नहीं...नहीं...ऐसा नहीं हैं....बचाओ!बचाओ!बचाओ!..ऽऽऽ....वह हड़बड़ा कर हांफते-कांपते हुए सोते-सोते उठ बैठा। पत्नी भी फौरन हड़बड़ाते हुए गहरी नींद से जाग गई। जल्दी-जल्दी पति को संभालते हुए घबराए स्वर में बोली-क्या हुआ? क्या हुआ? पति अपनी फैल चुकी खौफजदा आंखों से बोला-पानी पानी.... पिता जी सपने में आये थे। गर्दन दबाए जा रहे थे। गालियां दिए जा रहे थे।

पत्नी पति को पानी का गिलास पकड़ाते हुए-आप के पिता जी को स्वर्गवासी हुए पूरे पांच बरस हो गये। अब कहां से आ गये। पिछले कई सालों से आप से मैं कह रहीं हूं कि यह समाचार चैनल छोड़ दो। जब से आप इसमें घुसे हैं, न दिन में चैन और न रात को सुकून है?

पति-अगर छोड़ दूं,तो इतना पैसा और कहां मिलेगा। ये गाड़ी मोटर, और ये दुनिया भर की शान-ओ-शौकत कहां से मिलेगी?

पत्नी बोली-तो इसे ही लिए बैठे रहो। इसे ही चाटो। फिर तुम्हें सारा सुख-चैन इससे क्यों नहीं मिलता। क्यों हमेशा परेशान रहते हो और अब आये दिन, रात में भी नींद में बड़बड़ाते हुए न खुद सही से सोते हो न हमें सोने देते हो। सच्चा काम करने वाला, सच कहने वाला, न तुम्हारी तरह घबराता है और न रात में कव्वाते हुए, भरे जाड़े में, पसीना-पसीना होकर, पानी-पानी मांगते हुए हांफता-कांपता है।

पति खामोश था। पत्नी का लेक्चर जारी था। अब पति के माथे पर बल पड़ता जा रहा था, तब कुछ सोचते हुए, कुछ विचारते हुए वह पत्नी की जली-कटी पर अपनी विनम्र वाणी से शीतलता बिखेरते हुए बोला-तुम शायद सही कह रही हो। कल से संपादक के पास अपने गिरवी पड़े जमीर को उठाने की जुस्तजू करूंगा। और सत्ता के रेट कारपेट पर मटरगश्ती करती अपनी कलम को भी काबू में करने की भी कोशिश करूंगा।

पत्नी-लेकिन तब शायद आप की हवेली की शान-ओ-शौकत जाती रहे।

पति रूंधे गले से-कोई गम नहीं। अब तक अपनी कलम बेच कर, अपना बहुत चैन-सुकून गंवा कर, बेइंतिहा अन्दर से मैं बहुत टूट चुका हूं। अब और अगर कांच के शीशे की तरह टूट गया। चिन्दी-चिन्दी बिखर गया, तो कहीं का न रहूंगा। फिर क्या करूंगा इस बेवफा जागीर का और इस बेमुरव्वत शोहरत का।

पत्नी पति के गले लग कर बोली-जब जागो तभी सवेरा।

पति-मेरा तो, इस आधी रात ने, मेरी आंखों पर पड़े इस बनावटी, दिखावटी और मतलबी दुनिया के अंधेरे का पर्दा हटाकर सबेरा कर दिया है।


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