मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 100, जनवरी(प्रथम), 2021

हाथ और उसकी लकीरें......

वीरेन्द्र कौशल

हर हाथ को मिले काम काम के ही होते दाम कभी फतेह य़ा फिर बदनाम चाहे बदनाम फिर भी नाम नाम से ही होती पहचान काम बनाये असली शान शान से क्या होती तकदीर गर्म य़ा सर्द उसकी तासीर तासीर माने कई जैसे पैसा क्या फिर कोई मेरे जैसा फिर तो बस जैसे को तैसा मिल जाये सब चाहे हो कैसा जैसा कैसा फिर भी अपना मापदंड न फिर कोई नपना किस्मत के सब निराले खेल कोई पास होते हुये भी फेल जीवन में बस हिम्मत ज़रूरी फिर न आड़े कोई मज़बूरी मज़बूरी य़ा हाथ की लकीरें कुछ नहीं होती यह लकीरें आओं लिखें सब नई तदबीरें हाथ और उसकी लकीरें हाथ और उसकी लकीरें.....


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें