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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 100, जनवरी(प्रथम), 2021

नए देवता

सलिल सरोज

चौदह करोड़ देवता जो रोज़ पूजे जाते हैं लेकिन फिर भी सब मिलकर इस मुल्क की गरीबी और भुखमरी को दूर नहीं कर पाते हैं इतने पर भी जनता हर पाँचवें साल नए देवता का चुनाव करने लगती है या तो जनता तरसने की आदी हो गई है या फिर सारे देवता तरसाने के आदी


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