मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 100, जनवरी(प्रथम), 2021

मन्दिर जो घर नहीं होता

रवीन्द्र दास

सभ्यता में पहले मन्दिर नहीं थे पहले घर बना इस आधार पर यदि विचार करने बैठें तो मनुष्य देवताओं से पुरातन ठहरता है लेकिन हम सभ्य सुसंस्कृत लोग जो आस्थावान हैं ईश तत्त्व के प्रति नहीं सोचना पसंद करते हैं इन पक्षों पर घर मनुष्यों ने खुद बनाया बसाया भी मंदिर बने राजाज्ञा से श्रम भले ही किया हो मनुष्यों ने अर्थ दान भी किया हो उस पर अधिकार मनुष्यों का नहीं था कभी वह देवस्थान ही हुआ अब, चूँकि देवता होते नहीं होते हैं मनुष्य किन्तु आरोप करना उतना भी नहीं था कठिन कुछ मनुष्य ठहराए गए देव तुल्य मन्दिर भले ही घर न था, एक खूबसूरत मकान और इसलिए अचल संपत्ति के रूप में पहले दिन से था देवता थे नहीं नाम था देवता का सो देवता के लिए जो चाहिए था नाम मात्र चाहिए था किन्तु स्मरण रहे मन्दिर घर नहीं था जो मन्दिर जाता है वो घर नहीं, मन्दिर जाता है मन्दिर का एक पुजारी होता है देवता अधिष्ठित होते हैं मन्दिरों में जो अपने भक्तों से चढ़ावा चाहते हैं इसके बदले वे पूरी करते हैं मनोकामनाएँ मनुष्य मनुष्य पर यकीन नहीं रखता देवता पर रखता है जबकि जानता है वह कि नहीं जानता है वह धीरे धीरे मंदिर हो जाता है घरों से बहुत अधिक मजबूत कि भूकंप में गिर जाते हैं घर मन्दिर रहते हैं अक्षुण्ण यह देवताओं की महिमा है तो भी, मन्दिर घर नहीं होता घर टूटता है तो कुछ लोग बेघर हो जाते हैं मन्दिर के विषय में ऐसा नहीं कहा जा सकता


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें