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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 5, अंक 100, जनवरी(प्रथम), 2021

गरीब कच्चा माल

रवीन्द्र दास

कोई चुनावी उम्मीदवार जब किसी बूढ़े, कमजोर या लाचार से साथ खड़ा होकर उतरवा रहा है अपना फोटो उस समय क्या चल रहा होता है उसके मन में? देखने में वह दृश्य बेशक अश्लील दिखता है कि उभर आता है लोकतंत्र का वह चेहरा कि जैसे हमारे समाज के दो कैसे चेहरे हैं गरीब सोच रहा होता है अपनी कल्पित खुशहाली के विषय में और उम्मीदवार अपनी जीत के विषय में हालांकि बात बेढब है कि किसी और की जीत से किसी और को कैसे फायदा होगा पर सोचना होता है और जीत जाने के बाद सांसदों को बहुत सी मर्यादित जिम्मेदारियां निभानी होती है उसे तो सोचना होता है बहुतों के बारे में अगली जीत के बारे में कि वह गरीब सनद की मुहर की चिपका रह जाता है किसी रद्दी में बिक गए अखबार में जबकि फोटोशूट के समय वह होता है प्रतिनिधि बहुसंख्य अनाम गरीबों का लोकतंत्र में, खासकर भारतीय लोकतंत्र में कच्चा माल होता है गरीब एक नोट, मुट्ठी भर अन्न, एकाध वस्त्र के बदले मान लेता है मसीहा किसी भी हिंस्र को इससे अधिक उम्मीद है नहीं उसकी आंखों में


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