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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

फाइल गुमाने का सुख

सुशील यादव

कन्छेदी उस दिन उतरा हुआ मुँह लेकर शाम को घर आया ,मैंने पूछ क्यों क्या बात है बड़े उदास दिख रहे हो ?वो बोला हाँ भाई उदास होने का कारण तो है ,कोई खुशी से तो अपना चेहरा लटकता नहीं ।मैंने कहा साफ –साफ बताओ ,किसी से कुछ कहा-सुनी वाली बात हो गई क्या ,तुम आए दिन खामोखा हर किसी से आफिस में आफिस के बाहर भिडते रहते हो ।

नहीं भाई ,आप तो हमेशा मुझे लड़ने–झगडने वालो की केटीगिरी के समझते हैं,मैं वैसा हूँ नहीं।दूसरे लोग ही मुझसे टकराते हैं तो जवाब देना चाहिए के नहीं ?मैंने कहा जरूर देनी चाहिए, मगर जवाब देने में रोनी सूरत कहाँ बनती है ?बताओ क्या हुआ ?

कन्छेदी ने बताया,हमारे आफिस में आजकल फाइल-फाइल का खेल चल रहा है।किसी के टेबल में खुले में फाइल रखी हो तो गायब हो जाती है ।बड़े बाबू को हमने रिफंड की फाइल अपने हाथ से दी थी,वे साफ मुकर गए कि उन तक फाइल आई ही नहीं ।रिफंड अगर पार्टी को समय पे ण मिले तो हंगामा हो जाएगा ।सब ओरीजनल डाक्यूमेंट फैल में होते हैं ।रि-कास्ट करके नया भी नही बनाया जा सकता । अब पार्टी को क्या बताऊँ ,समझ में नहीं आ रहा है ।

मैंने पूछा ,सब जगह तलाश कर लिया ,ड्राअर,अलमीरा ,डिस्पेच सब जगह फिर से चेक करो ,जायेगी कहाँ ?

अरे हम इतना भी नही जानते कि गुम फाइल को कहाँ –कहाँ ढूढा जा सकता है ?हमने पूरी ताकत फाइल ढूढने में झोक दी,और तो और अपने कलीग्स ,प्यून को भी अच्छी –खासी मेहनत करवा दी। सब बेकार ।मिलने की होती तो गुमती ही क्यू ?

मैंने पूछा ,किसी का हाथ तो नहीं ?

उसने कहा ,शक करने में क्या ?हर चेहरा देख के लगता है ,हो न हो इसी का काम है ।

फिर अब क्या होगा ?

कन्छेदी मायूसी से बोला ,चार्ज शीट,सस्पेंशन ,इन्क्वारी ।

अब काम करने का मजा ही नहीं रहा ।ज़रा सा ढंग का चार्ज मिलता नहीं कि आफिस वाले जलने लगते हैं ।

टांग खिचाई में लग जाते हैं ।बॉस के अनाप-शनाप कान भरने की होड सी लगी रहती है।

मैंने पूछा ,ऐसा पहले भी कभी हुआ है ?कन्छेदी ने कहा,जब से सुपरवाइजर आये हैं ,तब से आए दिन किसी न किसी की फाइल का लोचा होते रहता है ।रुटीन की आम फाइल तो निपटते रहती है मगर जहां मेडिकल ,टी.ए. बिल भुगतान हो वे सब जाने कब कहन गायब हो जाती है ।हडकंप सा मचा रहता है ।जिस किसी को देखो वही पूछता है,मेडिकल वाली दिखी क्या ?दूसरा बताता है ,अपनी टी.ए वाली ही कब से नहीं मिल रही है ,क्या बताये ?

मैंने कन्छेदी से कहा ,कन्छेदी ,जितना तुम बता रहे थे मर्ज उतना बड़ा नहीं है ।

कन्छेदी ने मेरी तरफ आश्चर्य-मिश्रित मुँह-फाड अंदाज में देखा ,मतलब मैं समझा नहीं ।

मैंने कहा ,देखो तुम्हारी फाइल गुमी-उमी नही ।ये प्रायोजित गुमने-गुमाने का खेल है ।सुपरवाइजर ,एक तीर से दो निशाने लगा रहा है ।नया है ,मुँह से बोलता नहीं ,हथकंडो से उगलवाता है ।कल वो पार्टी को बुलावायेगा ,तुम्हे उसके सामने हडकायेगा,फाइल ढूढ के तुरंत लाने को कहेगा ,पार्टी को आश्वस्त करेगा कि जैसे ही फाइल मिलती है वो रिफंड पास करवा देगा ।

हप्ते भर बाद,कन्छेदी डिब्बे भर मिठाई के साथ आया।मैं फाइल प्रसंग भूल ही गया था।

उसने कहा ,प्रभु आप तो अन्तर्यामी हो।हुबहू वैसा ही हुआ जैसा आपने कहा था।सुपरवाइजर ने पार्टी को बुलवाया ,मुझे हडकाया, उसे आश्वासन दिया कि वो देख लेगा ।पार्टी के जाने के बाद मुझसे कहा कि ठीक से अपने टेबल ,ड्रार देख के आओ ,फाइल के पैर तो होते नहीं कि अपने आप कही चली जायेगी ?और सच में फाइल मेरे टेबल के नीचे पड़ी मिल गई ।


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