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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

प्‍याज का धर्म

मुकेश पोपली

घर के पास लगे साप्ताहिक बाजार में सब्‍जी के लिए घूमते हुए पुराने पत्रकार मित्र मिल गए, मैं उन्‍हें देखकर हैरान। इसलिए नहीं कि वे सब्‍जी लेते हुए मिले बल्कि इसलिए कि उनकी आंखें गुलाबी हो रही थी। गले में सांस अटक रही थी। आवाज कांप रही थी। मैंने उनके हाथों की ओर देखा तो दोनों हाथों में सब्‍जी से भरे थैले थे। उनकी भी नजर मेरे खाली थैले पर थी, बोला नहीं जा रहा था तो इशारा कर रहे थे। शायद कह रहे थे, सब्‍जी बाजार में तुम्‍हारा स्‍वागत है, मैंने तो सब्‍जी ले ली है, तुम भी ले लो। मुझे उन पर दया आने लगी थी कि इस उम्र में भी वे सब्‍जी खरीद रहे थे और दोनों हाथों में थैले उठाकर धीरे-धीरे चल रहे थे। इस बीच में उन्‍होंने एक आलू-प्‍याज वाले की तरफ भी ईशारा किया। मैंने देखा अच्‍छी किस्‍म के आलू थे भूरे-भूरे और प्‍याज भी इतने गुलाबी जैसे किसी गोरी के नैनों में छाया नशा। अचानक मैंने फिर मित्र की आंखों में झांका। गुलाबीपन अभी भी वहां था, मुझे लगा आज दिन में ही चढ़ाकर आए हैं। उनके गले से एकदम आवाज निकली, “बंधु, प्‍याज फिर से रुलाने लगा है। मत लेना, बहुत महंगा है।” मुझे लगने लगा कि मेरी आंखें भी गीली हो रही हैं। जेब से रुमाल निकालते हुए मैंने उनको ‘धन्‍यवाद’ कहा और दूसरी तरफ मुड़ गया।

दरअसल, मैं आलू और प्‍याज लेने ही सब्‍जी बाजार में आया था। यह वरिष्‍ठ मित्र तो अपना धर्म निभाकर चले गए लेकिन अब मैं क्‍या करुं? आज तक मैं अपना धर्म निभाता आ रहा हूं और इस दुनिया में सब लोग अपने-अपने धर्म का बहुत अच्‍छी तरह से निर्वाह करते हैं। अब देखिए न, आप भी तो धर्मावलंबी हैं। फिर आपके पड़ोस वाला किराने का व्‍यापारी, आपके अधिकारी, आपके मातहत, आपके मोबाइल के लिए चौबीस घंटे सातों दिन सेवा देने वाली कंपनी, पानी, बिजली, गैस कंपनियां, आपकी गली का चौकीदार, आपका कार ड्राईवर, आपका ट्रेवल एजेंट, आपका शेयर ब्रोकर, आपका बैंकर, आपके बेटे की महिला मित्र, न न....शरमाइए मत, आपकी दिलरुबा, आपकी काम वाली बाई, आपका नाई, आपका पड़ोसी, आपकी पड़ोसन और हां जिसके साथ धर्म हमेशा से ही जुड़ा है, हां भई हां, मैं आपकी धर्मपत्‍नी की ही बात कर रहा हूं। हुआ यूं कि मेरे बच्‍चों की अम्‍मा इन दिनों श्राद्धपक्ष और नवरात्रिपक्ष का पुण्य कमाने प्रयाग नहाने गई हुई है। मैंने उससे कहा भी था कि तुमने मेरे सामने तो आज तक कोई पाप किया नहीं, फिर किस पाप को दूर भगाने और पुण्‍य कमाने के लिए प्रयाग जाना है? दिल्‍ली में तो वैसे भी घरों में यमुना का पानी आता है? गर्म-ठंडा जैसी इच्‍छा हो शॉवर चलाओ और नहाओ। मैं भी सहयोग करने को तैयार हूं। उसने अपने कानों पर हाथ लगाकर राम-राम बोलते हुए मुझे धर्म के नाम पर आधे घंटे तक वो भाषण सुनाया कि थक-हारकर मुझे उसे प्रयाग जाने की अनुमति देनी ही पड़ी। कुंभ मेले में किसी कारण से जा नहीं पाई थी, तब से ही धुन सवार थी। अपनी धर्मपत्‍नी के भाषण के बीच ही मैंने सोच लिया था कि अब मुझे भी अपना धर्म निभाना चाहिए। कुछ दिनों तक शांति से रहने का मौका मिलेगा और फिर बहुत समय से दोस्‍तों की महफिल भी नहीं जमी थी। इसी महफिल के लिए मुझे पकौड़े बनवाने का ख्‍याल आया तो आलू-प्‍याज तो बहुत जरूरी थे। अब यह पत्रकार मित्र अपना धर्म निभाकर मुझे पसोपेश में डाल गए।

दरअसल मैं भी बहुत से लोगों के ऐसे धर्म निभाने की मंशा को जानता हूं लेकिन, एक लेखक होने के नाते मुझे कोई अधिकार नहीं है कि मैं हर किसी के जीवन के बिल्‍कुल अंदर तक पहुंच जाऊं और फिर कुछ ऐसा लिख दूं या बोल दूं या दिखा दूं कि मेरा नाम सलमान रुश्‍दी, आशीष नंदी या फिर कमल हासन हो जाए। दरअसल मीडिया और मीडिया से जुड़े लोगों से मेरी ज्‍यादा बनती नहीं है। कब कौन किसकी पोल खोलता है? किस तरीके से खोलता है? इस पोल को खोलने के खेल में कौन-कौन हावी है? किसको कितना पैसा हवाला से मिलता है? किसको महंगे होटल या हवाई यात्राओं के पास मिलते हैं? किसकी कितनी टीआरपी बढ़ रही है या घट रही है, मुझे सब पता चल जाता है। ऐसा नहीं कि मैं कोई ‘डायनेमो’ हूं या फिर ‘एसीपी प्रद्युमन’ हूं, लेकिन दाई से पेट कब तक छिपा रह सकता है। यह पत्रकार भी पड़ी लकड़ी उठाते हैं। एक अखबार में खबर आई ‘प्‍याज ने फिर रुलाया।’ दूसरे ने शीर्षक बनाया ‘प्‍याज बना आंखों का दुश्‍मन।’ तीसरे ने तो यह कहते हुए सारी हदें पार कर दी कि ‘प्‍याज पर तकरार, सरकार के दिन बचे हैं चार।’ मेरी समझ में नहीं आता कि हमारे देश में आज तक क्‍या सिर्फ प्‍याज ही महंगा हुआ है जो प्‍याज पर सरकार चली जाएगी। लेकिन कभी-कभी इतिहास अपने आपको दोहराता भी है। वर्षों पहले ऐसे ही प्‍याज के महंगे होने के कारण एक सरकार गिर गई थी और आज तक नहीं उठी। माना कि प्‍याज गरीबों का भोजन है लेकिन कौन सा अमीर ऐसा है जो प्‍याज नहीं खाता? ऐसा कौन है जिसकी आंखों में प्‍याज काटते वक्‍त आंसू न आए हों? प्‍याज अपना धर्म ही तो निभा रहा है। उसका धर्म है आपकी आंखों में आंसू लाना। उसका धर्म है आपकी रसोई की शान बनना। उसका धर्म है किसी भी सब्‍जी का स्‍वाद बदलना और हम हैं कि सरकार को कोस रहे हैं। इससे पहले कि मेरे मित्र मुझे कोसें, मैंने सब्‍जी वाले की आंखों में आंखें डालकर उसे दो किलो प्‍याज और दो किलो आलू देने को कहा तो उसकी बांछे खिल उठी। उसने मुझे हरी मिर्ची और धनिया के साथ-साथ दो प्‍याज भी मुफ्त में दिए। मैंने भी उससे कोई मोलभाव नहीं किया था और न ही मैंने उससे श्रीमती जी की तरह तराजू सही करने के लिए कहा था। इससे पहले कि मैं वहां से थैले उठाकर घर का रास्ता नापता, मैंने अपना धर्म निभाते हुए धर्मपत्नी को फोन कर उसके सकुशलता के समाचार ले लिए। फिर मैंने सब्‍जी बाजार में मिले अपने पत्रकार मित्र और दो-चार दूसरे मित्रों को एसएमएस भेजा, प्‍याज का असली मजा लेना हो तो शाम को घर पर आ जाओ।


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