मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

क्यों मेरी ग़लती पर ही नज़र रहती है

डॉ. अनिल चड्डा

क्यों मेरी ग़लती पर ही नज़र रहती है, ऐसे भी कभी क्या कोई बात बनती है। इक जमाना गुजर गया मुलाकात हुए, दिल में यादों की पर बारात बसती है। छोड़ना था तो हाथ पकड़ना ही न था, जिंदगी क्या कभी अकेले कटती है। कभी हँसते ही रहते थे हम जिंदगी में, आज जिंदगी हम पर ही हंसती है। अरमान तो दिल के सदा रहते हैं जवां, बस अपनी जिंदगी ही कम पड़ती है।

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें