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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

धीरे-धीरे जख्म भरने लगा

डॉ. अनिल चड्डा

धीरे-धीरे जख्म भरने लगा, पर, यादों का पस रिसने लगा। कोई लाख दिल तोड़ा करे, दिल फिर हरकत करने लगा। कांटे बिछते रहे राह में, उन्हीं पर मैं चलने लगा। वफ़ा जब भी की किसी से, बेवफाई का सिला मिलने लगा। हम उठाते रहे बार-बार उसे, वो बार-बार फिर गिरने लगा।

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