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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

साहित्य और मठाधीश, अल्पज्ञान और प्रसिद्धि

राज शेखर भट्ट

साहित्य... जिसकी तपस्या सदियों से होती आई है, उसने हर क्षेत्र में समाज का आईना बनकर प्रत्येक इनसान को बुराईयों से भी बचाया है। साहित्य के साधकों में सूरदास, कबीर दास, रहीम, रसखान और मीरा भी थीं। समय आगे बढ़ा और कुछ बदलाव भी हुये, लेकिन तब भी महादेवी वर्मा, सुमित्रानन्दन पंत, मैथलीशरण गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' और कालीदास जैसे साहित्य के तपस्वियों को कौन भूल सकता है।

बहरहाल, उपरोक्तानुसार साहित्य के पुजारी बहुत थे और हैं और यही वो सितारे हैं, जिन्होंने साहित्य को जाना है, पहचाना है, समझा है और कठिन साधना की है। इन साधकों ने प्रसिद्धि की ओर अपना कदम नहीं बढ़ाया, बल्कि साहित्य को पूजा और प्रसिद्धि स्वयं इनके कदमों को चूमने लगी। लेकिन वर्तमान का चेहरा थोड़ा बदल सा गया है। अब का हाल कुछ यूं है कि साहित्य का 'स' पता नहीं है, लेकिन साहित्य के पुजारी बने बैठे हुये हैं। पत्रकारिता का 'प' पता नहीं, लेकिन सम्पादक की कुर्सी पर हैं। राजनीति का 'र' पता नहीं, लेकिन कोई सांसद तो कोई मंत्री की कुर्सी गर्म कर रहा है। शिक्षा का 'श' पता नहीं, और शिक्षक का चोला ओढ़े हुये हैं।

कुल मिलाकर आज के समय में सिर्फ एक शब्द ही पुष्टि योग्य लगता है, जिसे 'मठाधीश' कहा जाता है। समाज में हर क्षेत्र को एक 'मठ' के रूप परिभाषित किया जा चुका है। राजनीति, शिक्षा, पत्रकारिता और साहित्य भी एक 'मठ' की भांति विकराल रूप बना चुके हैं। अब 'मठ' का 'मठाधीश' भी अपने अंदर अहं भावना और घमण्ड से जीवन जी रहा हो तो न मठ का विकास होगा और न ही मठ के अन्य सदस्यों का।

'साहित्य बनाम प्रसिद्धि' इस शीर्षक को केवल 'बनाम' लगाकर ही उद्भोदित नहीं किया जा सकता, बल्कि 'साहित्य और प्रसिद्धि', या 'साहित्य की प्रसिद्धि' भी कह सकते हैं। लेकिन ऐसा क्यों संभव नहीं है, सोचने वाली बात यह है। दरअसल, यह भी देखा गया है कि साहित्य प्रदूषित भी हो रहा है, साहित्य से लोग मुख भी मोड़ रहे हैं, साहित्य को केवल अपनी प्रसिद्धि के लिए भी प्रयोग में लाया जा रहा है, विदूषक टिप्पणियों और प्रतिउत्तरों में भी साहित्य उपयोग में लाया जा रहा है, महान साहित्यकारों की पंक्तियों को बेमेल दिशा से जोड़ा जा रहा है।

हालांकि, ऐसा हो रहा है, लेकिन यदि परिवार के मुखिया ही अपने अनुजों को उचित रास्ता न दिखायेंगे और नये रचनाकार बड़े साहित्यकारों से कुछ सीखने की चाह नहीं रखेंगे तो उनकी इच्छा केवल प्रसिद्धि तक ही सीमित रह जाएगी। सीखने, जानने और समझने की चाह रखने वाले ही साहित्य के दीवाने बन सकते हैं। क्योंकि जो माता सरस्वती को पूजेंगे तो माता लक्ष्मी स्वयं आयेंगी और प्रसिद्धि भी चरणों में होगी।

अब 'मठ' के मठाधीशों की बात करें तो क्या यह उचित है? जो प्रतिष्ठित, प्रसिद्ध कवि/लेखक हों, उन्हीं को हर बार मंच दिया जाय, वही मंच संचालन करें। नये रचनाकारों को हुनरमंदों को, प्रतिभावन रचनाकारों को भी आगे बढ़ाने का सोचना चाहिए। पेट से सीखकर कोई नहीं आता और सीखना भी स्वयं है। अगर मठाधीशों ने नये रचनाकारों की रचना पढ़कर, अपनी ओर से सुझाव और शिक्षा दे दी तो छोटे थोड़ी हो जायेंगे।

सोशल मीडिया में देखने में आता है कि मठाधीशों की टिप्पणियां अधिकांश वरिष्ठ मठाधीश, समान मठाधीश या अपने चित-परिचितों की पोस्ट पर ही होते हैं। अंततः इतना कहूंगा कि प्रसिद्धि पाने के लिए ही साहित्य नहीं लिखा जा रहा है, बल्कि इसे अल्पज्ञान और साहित्य की लड़ाई भी कहा जा सकता है। मठाधीशों के अहं भाव के चलते भी नये रचनाकारों का ज्ञान केवल प्रसिद्धि तक अटक कर रह गया है। बारहखड़ी का ज्ञान हो न हो, बारह पंक्तियों का मुक्तक लिखकर छोड़ना है। यदि साहित्य को जानना है तो सर्वप्रथम पढ़ो, समझो, ग्रहण करो, चिंतन करो, साहित्य को जानो, पहचानो... तब लिखना प्रारम्भ करो।


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