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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

धर्म और कर्म - मनुष्य की मनोस्थिति..

अल्पा मेहता

धर्म ओर कर्म हमारे दिमाग़ की उपलब्ध वो स्थिति है जो मनुष्य चाहते हुए भी उसे पूर्ण रूप से न्याय नहीं दे पा रहा है.. धर्म वो है.. जिससे सिर्फ हमारा ही कल्याण न हो परन्तु जो भी जीव हमारे आसपास हो.. चाहे वो मनुष्य हो या प्राणी, जीव जन्तु हो उन सभी का कल्याण हो.. हमारी उपस्थिति में उन सभी का जाने-अनजाने मे बुरा न हो..उसी को धर्म कहते है.. और कर्म.. इसे कहते हैं.. जो हम हमारी मनोस्थिति.. में.. पैदा करके नेक.. या.. बुरा कार्य करते हैं.... प्रकृति ने हमें.. मनोस्थिति को नियंत्रण में रखने का हक़ दिया है, जिससे हम अपनी अलग अलग परिस्थियों मे सूझबूझ करके दिमाग़ को नियंत्रण करके सुकर्म.. या कुकर्म करें.. अब.. ये हम पर निर्भर है कि हम कैसे कर्म करें.. इसलिए कभी अपने किसी भी कर्म का दोष हमें दूसरो पर नहीं थोपना चाहिए.. कई बार लोग धर्म के नाम पर.. भगवान की पूजा तो कर लेते हैं .. पर इसी भगवान की बनाई हुई दुनिया में.. परिस्थितियों से हार कर कई बार कुकर्म करते हैं.. ये लोग भगवान.. या किसी और को धोखा नहीं दे रहे.. मगर खुद को ही धोखा दे रहे हैं.. अगर मानवधर्म को सही में समझा जाये.. तो सत्कर्म.. करना बहुत आसान हो जायेगा...

अलग अलग धर्म में अलग-अलग भगवान को पूजना ये हमारी श्रद्धा है.. जिससे हमें.. आत्मविश्वास मिलता है.. जो हमारा moral support है.. पर किसी भी धर्म में ये नहीं लिखा कि..अगर भगवान को पूजा जाये तभी धर्म कहलाता है.. वही धर्म है.. नहीं.. ऐसा हरगिज नहीं है.. जब मनुष्य किसी और मनुष्य.. प्राणी को क्षणिक भी मदद के रूप में देता है तो वो मनुष्य उत्तम धर्म निभा रहा है.. इससे ये.. कहा जाता है कि धर्म और कर्म एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, पर ये तभी मुमकिन है अगर धर्म की परिभाषा.. सही में समझी जाये..

मैंने सिर्फ अपना मंतव्य प्रस्तुत किया है..


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