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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

आओ कल का भाग्य बनाये

सुधेन्दु द्विवेदी 'यश'

आओ कल का भाग्य बनाये ,कल के भारत को फिर लाये। आदर्शों का हो आरोहण, सदधर्मों से हो न विचलन। यही भव्य भारत था कल का , जहाँ सत्य का बजता डंका। धर्म सिंधु में गोता खाकर, नित नव निधि ओर मुक्ता पाएं। आओ कल का भाग्य बनाये।......... आज संस्कृति रुदन कर रही ,दीन दशा में अपनी जी रही। कभी थी स्वर्णिम इसकी काया ,रह गई मात्र अतीत की छाया । चीख रही भारती बिलख कर, विश्व गुरु बन तुष्ट कराए। आओ कल का भाग्य बनाये....... कर्म हीन हो गया आज नर, निरुद्देश्य जीवन निष्क्रिय कर। भाग्य वाद की चादर मैली, जन जन के मन मे है फैली। कर्मवाद का शंख बजा कर ,फिर से गीता ज्ञान कराए। आओ कल का भाग्य बनाये।


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