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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

भावना

रोहितश बैरवा

मुझे न तुमसे गिला है कोई रहो हमारे चाहे कही भी चले जाओ तुमने किया वो थोड़ा नही था हमने किया वो भी कम नही था मैने किया स्वभाव था मेरा तुमने किया अधिकार था तुम्हारा हँसके मिले थे हम, हँसते भी रहना ये दुआ है मेरी लेते भी जाओ खड़ी हूँ जिसके इशारे की प्रतीक्षा में अभी अब तो रूठ गया है मुझसे वही जब हम मिले थे तो जीवन था सरगम जाने से उसके अब आँखे है मेरी नम मुझसे बेहतर मिल जाये गर तुम्हे है ये विश्वास तो बेशक चले जाओ तुम रहो हमारे चाहे कही भी चले जाओ मुझे बातें सारी याद है पुरानी मन में छुपी है एक हसीन कहानी मेरे दिल में है तेरी सारी तस्वीरे लोग पूछते है अब तो हाल मुझसे तेरे गर जानने है हाल आपको मेरे तो जरा लौट भी आओ रहो हमारे चाहे कही भी चले जाओ


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