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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

कूच कर गया होगा भगवान

रवीन्द्र दास

कितनी जरूरत रह गई है मंदिरों मस्जिदों अथवा गिरजों की इस पर समानांतर बहस हो सकती है होती भी रही है युगों युगों तक इन्हें मानवीय बनाते हुए बदला जा सकता है घरों में ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि ईश्वर की मानवेतरता कब बदल गई अमानवीयता में यह तो नहीं जानता होगा स्वयं सर्वज्ञ ईश्वर भी और यदि वह सब कुछ जानता हुआ भी टिका हुआ है मंदिरों मस्जिदों अथवा गिरजों में तो नहीं हो सकता है वह भक्तवत्सल करुणानिधान अथवा उस पहले बेघर व्यक्ति को देखकर चुपचाप कूच कर गया होगा भगवान मंदिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों से


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