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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

पहाड़ टूटेगा

रवीन्द्र दास

पहाड़ टूटेगा जर्रा जर्रा बिखर जाएगा देबुआ का बेटा अनिरुद्ध मूतेगा खी-खी करता हुआ उस टूटे बिखरे पहाड़ पर जिसका मालवा भी गवाही नहीं देगा कि कभी वो पहाड़ भी था उस पहाड़ का टूटना किसी के सिर पर दुखों का पहाड़ टूटने जैसा नहीं होगा वो तो आफत आस्मानी के सर से टल जाने जैसा होगा. दिख रहा है आईने की तरह साफ़ कि हमारी भूल से खड़ा हुआ है वह दानव जैसा पहाड़ सद्भावनाओं और भाईचारा का लहू पीकर समझने लगा है ख़ुद को अपराजेय उड़ता रहता है आसमानों में कि ज़मीन पर पाँव रखना भी नहीं है गवारा बस एक बार लेनी होगी लंबी साँस सामूहिक रूप से वो लंबी साँस हिला देगी हमारी भावुकता भरी नासमझी से उठ आए हृदयहीन पहाड़ को कर देगी नेस्तनाबूत


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