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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

आदमी

रवीन्द्र दास

आदमी - १ ------- बंधे हाथ सिली जुबान कुछ भूख अदम्य जिजीविषा खून में उष्णता साँस में स्पंदन अभी बची है अरे यह तो मनुष्य है इसे सपने दिखाओ हमारे काम आएगा आदमी - २ ------- इसके पास कई गठरियाँ हैं सपनों की जिम्मेदारी की हार और जीत की अकेला नहीं होना चाहता हुआ खड़ा है किसी कोने में अकेला सारी गठरियाँ सम्हाले गा रहा है अपना मनपसंद गीत इस बात की चिन्ता किए बगैर कि लोग हँस रहे हैं उस पर एक गठरी और भी जो है उसके पास उम्मीद की आदमी - 3 ------ आदमी जो मुस्कुरा रहा है कुछ देर पहले बहस कर रहा था इंसानियत की तासीर पर कि आखिर कोई मनुष्य क्यों हो जाता है हैवान! वह जो एकाध बार को छोड़ कर हर बार रहा है ईमानदार वह नफरत करता है बेईमानों से आदमी की ही तो फितरत है कि झूठ की जुबान बोल लेता है कायदे और इत्मीनान से आदमी जो कुछ देर पहले गिड़गिड़ा रहा था अभी धौंस जमा रहा है बेझिझक ...


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