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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

नया साल

कवि राजेश पुरोहित

अच्छे दिन की आस में उन्नीस गुजर गया। दोस्तों फिर से संभलने का वक़्त आ गया।। मायूस देखा है आदमी को प्याज के लिए। भाव बढ़ते बढ़ते प्याज कहाँ से कहाँ आ गया।। रात भर जी एस टी ने सोने नहीं दिया आदमी को। नये सामान खरीदने का लो वक़्त आ गया।। पुराने नोट सा मन हो गया आदमी का दोस्तों। अब नये नोट जैसा बदलने का वक्त आ गया।। नया भारत बनेगा बुलेट ट्रेन चलेगी देश में। कलाम के सपनों का भारत बनाने का वक़्त आ गया।। गांधी की अहिंसा का पाठ फिर पढ़ने की जरूरत है। देश मे हिंसक घटनाओं को रोकने का वक़्त आ गया।। राम मन्दिर भी बनेगा लेकिन राम कौन बनेगा । सत्य के लिए असत्य से लड़ने का वक़्त आ गया।। मासूमों के साथ जो करते हैं अत्याचार दोस्तों। उन्हें फाँसी पर लटकाने का वक्त आ गया।। देश मे संस्कार सभ्यता जीवित कैसे रहे। मानवीय मूल्यों की स्थापना का फिर वक़्त आ गया।।

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