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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 76, जनवरी(प्रथम), 2020

बुआ

नरेन्द्र श्रीवास्तव

दोस्त, पड़ोसी सब ये कहते,तेरी तेज तर्रार बुआ। मैं समझाता मेरी तो है,ममता का भंडार बुआ।। छल,कपट,बेईमानी करें,जो दिखलाते चालाकी। पास फटकने कभी न देतीं,उनको है अंगार बुआ।। जो दिल में है वही जुबां पर,बाहर-भीतर इक जैसी। मन में कोई मैल न रखतीं, मन की हैं उजियार बुआ।। दीन,दुःखी पर दया दिखायें, पीड़ित देख द्रवित होतीं। सदा मदद को रहतीं आकुल, हरदम ही तैयार बुआ।। अपनी जिद पर जब अड़ जातीं,कहतीं जो वो पत्थर है। मानो तो सब है ठीकठाक,वरना करतीं तकरार बुआ।। सदा न्याय की पक्षधर रहतीं , सहन कभी अन्याय नहीं। हक जब तक हासिल न होवे, जीना करें दुश्वार बुआ।।

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